यारा में फिर चूक गए तिग्मांशु धूलिया, फिल्में हो रही हैं फ्लॉप पर फ्लॉप | bollywood – News in Hindi

यारा में फिर चूक गए तिग्मांशु धूलिया, फिल्में हो रही हैं फ्लॉप पर फ्लॉप

यारा

यारा पूरी तरह निराश करती है. फिल्म में गीत-संगीत की गुंजाइश होने के बावजूद उस पर सही काम नहीं हुआ. फिल्म बीच-बीच में कई जगहों पर ठहरी हुई बोर करती है.

मुंबई. लंबे समय से तिग्मांशु धूलिया (Tigmanshu Dhulia) के हाथ कोई बॉक्स ऑफिस सफलता नहीं लगी है. संभवतः यही वजह है कि वह निर्देशन से ज्यादा इन दिनों एक्टिंग में ध्यान लगा रहे है. बतौर निर्देशक लंबे समय से बनकर तैयार उनकी फिल्म यारा अब ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज हुई है. जिसे देख कर यही लगता है सफलता अब भी तिग्मांशु से दूर है. इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि यह निर्देशक खुद है. 2013 से उन्होंने बुलैट राजा, राग देश, साहेब बीवी और गैंगस्टर-3 और मिलन टॉकीज जैसी फिल्में बनाई हैं. जिनकी कथा-पटकथा काफी कमजोर थी. यह बात यारा पर भी लागू होती है. ये फिल्में देखकर साफ हो जाता है कि तिग्मांशु भारतीय कहानियों और दर्शकों की नब्ज पकड़ना भूल गए हैं. यारा की कहानी तिग्मांशु ने फ्रेंच फिल्म ‘अ गैंग’ स्टोरी से ली है. यारा इस विदेशी फिल्म का आधिकारिक रीमेक है.

फिल्म चार दोस्तों की कहानी है, जो बचपन से साथ-साथ बड़े हुए हैं. उन्हें अपराधियों ने पाला-पोसा है. ऐसे में इन्हें अपराधी ही बनना था. परम (विद्युत जामवाल Vidyut Jamwal), मितवा (अमित साध Amit Sadh), रिजवान (विजय वर्मा Vijay Varma) और थापा (केनी Keni) की यह चौकड़ी तस्करी, देसी कट्टों, हथियारों तथा कच्ची शराब का धंधा करती है और सुखी जीवन जीती है. तभी परम के जीवन में एक नक्सली लड़की सुकन्या (श्रुति हासन Shruti Haasan) आती है और तस्वीर बदल जाती है. एक गांव में पुलिस के छापे दौरान ये चारों पकड़ लिए जाते हैं और अलग-अलग मामलों में इन्हें सजा होती है.

मगर यहां इन चारों के गैंग में बाद में शामिल होने वाला पांचवा शख्स गायब हो जाता है. क्या उसने मुखबिरी की. जेल से छूट कर परम, थापा और रिजवान तो अपराध की दुनिया छोड़ कर व्यवसायी बन जाते हैं मगर मितवा उसी दुनिया में धंसा रह जाता है. करीब बीस साल बाद वह वापस आता है क्योंकि एक अंडरवर्ल्ड का अपराधी उसकी जान के पीछे पड़ा है. ऐसे में अपराध की दुनिया छोड़ने वाले तीनों दोस्त क्या करेंगे. यही दोस्ती की परीक्षा है.

फिल्म की समस्या यह है कि इसकी कहानी करीब चालीस-पैंतालीस बरसों में फैली है. जिसे तिग्मांशु ठीक से समेट नहीं पाए. कमजोर कहानी और कमजोर पटकथा, यारा की कमजोर कड़ियां हैं. विद्युत को छोड़ कर बाकी कलाकारों के किरदार भी सही ढंग से सामने नहीं आते. फिल्म कहीं रफ्तार नहीं पकड़ पाती. न इसमें थ्रिल है और न इमोशन. जबकि कहानी के केंद्र में अपराध और दोस्ती है. अतः यारा पूरी तरह निराश करती है. फिल्म में गीत-संगीत की गुंजाइश होने के बावजूद उस पर सही काम नहीं हुआ. फिल्म बीच-बीच में कई जगहों पर ठहरी हुई बोर करती है. कुल मिला कर यारा के दो घंटे 10 मिनट इतने समय से कहीं लंबे मालूम पड़ते हैं.

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